सट्टा बाजार

2 अप्रैल 2011 तो आपको याद ही होगा। यदि आपको याद नही तो मै याद दिलाता हूँ Mahendra singh dhoni के द्वारा वर्ल्ड कप फाइनल में वानखेड़े में कुलासेकरा को लगाया गया वो छक्का। अगले ही पल खुशी मुम्बई से लेकर पूरे भारत में करेंट की तरह फैल गयी,और क्यो ना खुशी हो भारत 28 साल के बाद चैंपियन जो बना था।
         अगर उन दिनों की बात की जाय तो हमारे गाँव में क्रिकेट का ज्ञान बिल्कुल शून्य था। जीतना क्या,लोग  भारतीय टीम के 5-7 खिलाड़ियों को छोड़ कर किसी को नही पहचानते थे, यहाँ तक की Virat Kohli , Ravichandran Ashwin (जो वर्तमान में भारतीय टीम के रीढ़ है और ipl में अपनी-अपनी टीम की कप्तानी कर विपक्षी टीम को परास्त करने में माहिर हैं) को बिल्कुल नही जानते थे। ये तो खैर टीम में उस समय नये थे लेकिन मुनाफ़ पटेल (हमारे भारतीय टीम के पूर्व तेज़ गेंदबाज इनका वर्ल्ड कप के दौरान काफी बढ़िया प्रदर्शन था) यदि उनको गेंदबाजी करते देखते थे तो ये लोग कहते थे की निरहुआ (भोजपुरी सुपर स्टार) आ गया ऐसा कहा जाता था उनके बारे में। अर्थात जहाँ भारतीय टीम के खिलाड़ियों से ज्यादा भोजपुरी फिल्म के हीरो को पहचाना जाता था ऐसा था मेरा गाँव।
         मुझे वह दिन आज भी याद है उस दिन मेरे घर से थोड़ी ही दूर (लगभग 100 मीटर) एक चौक पर टी. वी., बैटरी आदि की व्यवस्था की गयी थी ताकि बिजली जाने के बाद भी कोई दिक्कत ना हो मैच देखने में। जहाँ टी. वी. लगाया गया था वहाँ लगभग 30-40 लोग सुबह से ही बैठकर न्यूज़, सिनेमा आदि देख रहे थे। आखिर मैच शुरू हुई लगभग 2:30 बजे, मैं भी वहां पहुँचा वहाँ मुझे बच्चा होने के वजह से आगे बैठाया गया था। लगभग 100 लोग वहां मैच को काफी गंभीरता से देख रहे थे। हर एक गेंद डाले जाने पर उन लोगो की एक हास्यपूर्ण टिप्पणी होती थी। वो लोग खिलाड़ियों का जर्सी नं एवं नाम को याद करते थे न की उन्हें चेहरे से पहचानते थे। उन्हें क्रिकेट में होने वाले 10 तरह के ऑउट में केवल बोल्ड आउट पता था और वह ही समझ आता था। अगर बल्लेवाज क्लीन बोल्ड होता तो ठीक है नही तो किसी दूसरे तरीके से ऑउट होने पर वो अंपायर पर घूस लेने का आरोप भी लगाते थे। कुछ भी हो उन लोगों के टिप्पणी के बारे में जो भी कहा जाये तो कम होता।
          हालाँकि उन दिनों मेरा भी क्रिकेट में शून्य ज्ञान था लेकिन (मैंने 2009 से क्रिकेट देखना शुरू किया था) मुझे कुछ-कुछ जानकारी थी इसके बारे में।आखिरकार मैं आधा घंटा वहाँ क्रिकेट देखकर घर आ गया क्योकि मैं उनलोगों की हास्यपूर्ण टिप्पणी और उनके द्वारा खिलाड़ियों पर प्रयोग किये गये अपशब्दों से अपने आप को असहज महशूश करने लगा।
           उन दिनों की तुलना में 2017-18 की बात की जाय तो मुझे ऐसा लगता है की आज क्रिकेट का ज्ञान जितना मेरे गाँव में है उतना शायद भारत के किसी भी गाँव में नही। यहाँ के युवा क्या बच्चे भी पूरे वर्ष में होने वाले अन्तराष्ट्रीय, या किसी अन्य देशो में होने वाले मैचों, यहाँ तक की किसी दूसरे देशो के राज्यों में होने वाले लीग मैचों के बारे में दुरुस्त जानकारी रखते है। इतना ही नही दूसरे देशों/विदेशों में या वहाँ के राज्यों में खेले जाने वाले घरेलू लीग मैचों में खेले जाने वाले एवं अपने देशो/राज्यो में खेले जाने वाले मैचों में टीम का प्रदर्शन एवं उस टीम में खेलने वाले खिलाड़ियों का प्रदर्शन इत्यादि जुवान पर याद रखते है। उन लोगों को क्रिकेट के बारे में अब इतना पता रहता है,जितना मुझे क्या हमारे क्रिकेट एक्सपर्ट हर्षा भोगले, Aakash Chopra, Sanjay Manjrekar, Sunil Gawaskar जैसे दिग्गज क्रिकेट एक्सपर्ट को नही पता रहता है।
           मुझे यह नॉलेज देख कर काफी हैरानी हुई कि जहाँ 7-8 साल पहले लोग अपने देश के कुछ खिलाड़ियों को छोड़ कर बाँकियो को नहीं पहचानते थे वहां इतना नॉलेज? मैंने पता लगाना शुरू किया तो पता चला कि सभी को नही कुछ विशेष व्यक्तियों को ही इतनी जानकारी रहती है उनका जीवन इसी से चलता है क्योकि  यहाँ के लोग युवा, बच्चे एवं कुछ प्रौढ़ व्यक्तियों के जीवन यापन का सबसे आसान तरीका है सट्टेबाजी। अभी तो ताज़ा खबर ये है की ये लोग महिला क्रिकेट को भी नही छोड़ते है यहाँ तक की दृष्टिहीन क्रिकेट मैच और कबड्डी में भी अपने हाथ आजमा रहे है। गाँव का पूरा माहौल बदल गया है।अगर कभी जरूरी कारणवश देर शाम को घर से निकलता हूँ तो कुछ सटेरी पूछ देते है किस पर हो, क्या भाउ चल रहा हैं? तंग आ गया हूँ सटेरियो से।
           #SHAMEONUSATERIYO

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